jaunpur : वो राब का शर्बत और सुराही का पानी --

जौनपुर। आधुनिक परिवेश में रेडीमेड शीतल पेय की दौड़ में गांव देहात के देसी ठंडे पेय पदार्थ गुम होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी रंगीन, रसायन युक्त शीतल पेय पदार्थो को वरीयता दे रही है। भीषण गर्मी व उसके दुष्प्रभावों से निजात दिलाने के लिए पहले गांवों में देसी शीतल पेय पदार्थो का उपयोग होता था। ग्रामीण परिवेश में प्रमुखता से प्रयुक्त होने वाली गन्ने की चाशनी से बनाई जाने वाली राब अब मात्र बुजुर्गो की याद तक सीमित रह गई है। भीषण गर्मी में खेत खलिहान से लौटने पर अथवा किसी अतिथि के आने पर राब का शर्बत न सिर्फ गर्मी से राहत देता था अपितु लू के दुष्प्रभाव से बचाता भी था। बुजुर्ग बताते हैं कि राब के साथ सुराही का ठंडा पानी गर्मी से जो निजात दिलाता था, आज के बोतल बंद कोल्ड ड्रिक्स में वो बात नहीं है। बीते समय में राब गांवों में स्टेटस सिबल भी माना जाता था।   रेडी मेड शीतल पेय पदार्थो में प्रयुक्त होने वाले रंगों व रसायनों के दुष्प्रभाव से लोग बीमार पड़ रहे है   यह सेहत के लिए खतरनाक हैं। इसके अलावा खांड के लड्डू गर्मी में प्रमुखता से बनाए जाते थे लेकिन आधुनिकता की दौड़ में खांड अब मात्र देसी दवाओं में प्रयुक्त होता है। पौष्टिक एवं सुपाच्य मीठे सत्तू के रस और आम का पना भी अब नई पीढ़ी के लिए कौतूहल बनकर रह गया है।  ग्रामीण परिवेश में प्रमुखता से प्रयुक्त होने वाली नींबू की ठंडाई व बेल के शर्बत का आज बाजारीकरण हो गया है। आधुनिक युवा पीढ़ी नींबू के साथ बनी सोडा शिकंजी व बेल से बने शेक को तरजीह दे रही है। होटलों व रेस्टोरेंटों में इन पेय पदार्थो को अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि इनमें सेहत के लिए कुछ खास नहीं है।

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