रमज़ान का आखरी अशराजहन्नम से निजात का : आरिफ हबीब


जौनपुर । रमजान माह को तीन भागों में बांटकर इसकी खास फजीलत बयां की गई हैं. इस्लाम में रमजान के शुरुआती 10 दिन या अशरे को रहमत का अशरा बताया गया है. दूसरा 10 दिन का अशरा बरकत का व तीसरा 10 दिनों का
जहन्नुम से आजादी का अशरा
उक्त बातें मुस्लिम यूथ ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष व मरकज़ी सीरत कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष आरिफ हबीब ने कही है।
   श्री हबीब ने आगे कहाकि
इस्लामी धर्मग्रंथों में आखिरी अशरे की बहुत फजीलत बताई गई है, इसलिए इसे जहन्नुम से आजादी का अशरा कहा गया है. रमजान के दौरान एक रात ऐसी बताई गई है, जिसमें की गई इबादत हजार माह की इबादत से बढ़कर होती है. इसे 'लैलतुलकद्र' कहा जाता है. इसे पाने के लिए इस्लाम धर्म के सच्चे अनुयायी 10 रातों में नियमित रूप से जागकर इसे पाने का पूरा प्रयत्न करते हैं, इसलिए आखिरी अशरे में 'ऐतकाफ' करने या घरबार छोड़कर पूरी रात इबादत में गुजार देने का हुक्म है।
    रमज़ान के आखिरी अशरे में अल्लाह के बन्दे रातभर इबादत (कुरान पाक की तिलावत,अल्लाह का ज़िक्र,व तरावीह के साथ नफिल इबादतों में ) में मशगूल रहते है।
एतकाफ में इलाके के किसी एक शख्स के शामिल होने से पूरी इलाके की समुलियत हो जाती है।
रमज़ान का एक माह पूरी ज़िंदगी के लिए मार्गदर्शन है।
श्री हबीब ने कहा कि रमज़ान
हमे त्याग,सहनशीलता, सहिष्णुता, मानवाधिकार और हर तरह की बुराई से बचाने व नेक रास्ते पर चलने का प्रशिक्षण देता है।
हमे हमेशा रमज़ान के महीनों की शिक्षाओं पर अमल करते हुए जीवन व्यतीत करने का अल्लाह हुक्म देता है।

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