हमारी परम्पराएं, संस्कृति व सभ्यता सर्वश्रेष्ठः डा. शिवदत्त

जौनपुर। आर्य समाज के 117वें वार्षिकोत्सव पर आयोजित चतुर्दिवसीय यजुर्वेद परायण यज्ञ के ब्रह्म डा. शिवदत्त पाण्डेय ने कहा कि हमारी परम्पराएं, हमारी संस्कृति व हमारी सभ्यता सर्वश्रेष्ठ है। ब्रह्म से लेकर जैमिनी पर्यन्त सारे ऋषियों की पवित्र परम्पराओं द्वारा अनुप्राणित वेद धारा का मूल उद्देश्य ही है। श्ण्वन्तो विश्वमार्यम्य अर्थात् हम समूचे विश्व को श्रेष्ठ बनायेंगे। युगल किशोर त्रिपाठी ने बताया कि संसार में दो ही रास्ते हैं। एक देवयान व दूसरा पितृयान अर्थात् देवों का अमर मार्ग देवयान हैं और अपने पितरों का मार्ग पितृयान है। सुगम मार्ग है कि हमें हमारे माता-पिता को सेवा द्वारा सन्तुष्ट रखना चाहिये। उन्होंने कहा कि क्या लेकर आये हो बन्दे और क्या लेकर के जाना है, दुनिया एक सराय है, दो दिन का ठिकाना है..।’ भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा से पधारीं वेद विदुषी रेखा आर्या ने अपनी अभिव्यक्ति में रेखांकित किया कि इस बात पर मानव मात्र को चिंतन करना ही चाहिये कि वह संसार में क्यों आया है? अकेले में बैठकर विचार किया जाना चाहिये कि वह जो कर रहा है, क्या यही उसका कर्तव्य है? हमें अपना सम्बन्ध परमात्मा से जोड़ना चाहिये। स्वामी शंकर मुनि एवं आनन्द मुनि ने आयोजन से सम्बद्ध आर्यजनों को आशीष देते हुये कार्यक्रम की सराहना किया। गुरूकुल के ब्रह्मचारी मुदड्ढ्गल एवं पारम्गत की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। यज्ञ के यजमान धर्मवीर, पवन साहू, रतन साहू, डा. गोरखनाथ, हनुमान प्रसाद, जयकृष्ण जैकी, गौतम सोनी, धर्मेन्द्र कुमार, विमल गुप्ता आदि की सक्रिय भागीदारी से आयोजन सुगम बना। अन्त में आर्य समाज के प्रधान देवेन्द्र नाथ आर्य ने आगत सभी अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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